Saturday, September 6, 2014

ऐसा क्यों ?

साईं ने सोचा ना था ऐसा दिन आएगा
चढ़ावे की चाहत में कोई उनका ‘गला दबाएगा’

धर्मसंसद करके करेगा विधाता की बात 
पाखंडपूर्ण तरीके से लोगों को भरमाएगा

धर्म का झंडा उठाकर करेगा अधर्म की बात
धर्मांध होना लोगों को सिखाएगा 
साईं ने सोचा ना था ऐसा दिन आएगा

Saturday, May 17, 2014

आसमां के पार



चलो चलें
चलना ही नियति है
जीवन पर्यंत

चलो चलें
जहां मन को मिले शांति
और तन हो जाए तृप्त

चलो चलें
आत्मा से परे
परब्रह्मांड के पार
नहीं है वहां कोई शापित

चलो चलें
जहां नहीं विचरते मनुष्य
शायद रहते हैं देवता

चलो चलें
इस जंगल से दूर
व्योम की गहराईयों में
जहां मिले हवा की शीतलता

चलो चलें
गिरिराज की कंदराओं में
होने निर्विकार
तन से विरक्त
और मन से आशक्त

  

Monday, April 21, 2014

मेरा मन



ये मन भी बड़ा अजीब है
कभी नमकीन, कभी मीठी चीज है

कभी सूरज सा तेज, कभी चांद सा शीतल
आंसमा के आंचल में हवा के बीच है

थोड़ी ऊंचाई, थोड़ी गहराई
कभी हिमालय, कभी समुंदर के बीच है

तारों के बारात में
मछलियों के झुंड में
किस्से-कहानी, ख्यालों के बीच है

प्रकृति की कृति, बागों के फूलों में
भ्रमर राग के बीच है

ये मन भी बड़ा अजीब है
दीपक-पतंगे के प्रेम के बीच है

Thursday, April 10, 2014

पतंग...



पतंग को देखकर
याद आता है बचपन
चरखी, धागा और
मांझे की वो बात
कभी आंगन, कभी मैदान
मुंडेर और छतों पर
उड़ाते थे लाल,पीली,नीली पतंग
दोस्तों के साथ  
दांव-पेंच, जीत-हार
आसमान में लड़ती थी पतंगें
कभी जीतने की खुशी
कभी हार का गम
याद आता है वो बचपन
बचपन जो बीत गया
फिर नहीं लौटेगा
आज भी याद आता है

Saturday, April 27, 2013

बारिश...



बादल उमड़ेंगे-घुमड़ेंगे
आसमान में अठखेलियां करेंगे
तभी तो होगी बारिश

मौसम खुशगवार होगा
हरियाली होगी
फूल भी खिलेंगे
बनेगा इंद्रधनुष

खुश होगा वो मन
जो बारिश पर झूमता है
नाचता है...
और कभी-कभी गाता भी है

Sunday, October 7, 2012

मैंने उसे बालू फांकते देखा है ...


कांधे पर मैला झोला लटकाए
अपने होंठों से कुछ बुदबुदाता हुआ
कभी इस सड़क...
कभी उस चौराहे
अक्सर मुझे वो दिखता है

कभी हँसता, कभी रोता
कभी देर तक मुस्कुराता हुआ
सड़क पर मलंग की भांति वो चलता जाता है
बडबडाता हुआ शायद वो
उपरवाले से कुछ कहता रहता है

सड़क के सहयात्रियों से न टोक-टाक
न ही झगडा
बस अपने में ही रहता है

भूख लगने पर
कूड़े की ढेर में फेंकी
जूठन से पेट भरता है

अक्सर मैंने उसके हांथों में
पापड़ बनी रोटियों को भी देखा है
लेकिन, एक दिन मैंने उसे
बालू के ढेर पर बैठे देख
अपने आप को झंझोरा है
क्योंकि...
मैंने उसे उस दिन
बालू फांकते देखा है...

किराया

ये शहर किराए का है
किराए पर मिलते है घर यहां
सीने में धड़कते दिलों के
जज्बात भी किराए का है