Sunday, October 7, 2012

मैंने उसे बालू फांकते देखा है ...


कांधे पर मैला झोला लटकाए
अपने होंठों से कुछ बुदबुदाता हुआ
कभी इस सड़क...
कभी उस चौराहे
अक्सर मुझे वो दिखता है

कभी हँसता, कभी रोता
कभी देर तक मुस्कुराता हुआ
सड़क पर मलंग की भांति वो चलता जाता है
बडबडाता हुआ शायद वो
उपरवाले से कुछ कहता रहता है

सड़क के सहयात्रियों से न टोक-टाक
न ही झगडा
बस अपने में ही रहता है

भूख लगने पर
कूड़े की ढेर में फेंकी
जूठन से पेट भरता है

अक्सर मैंने उसके हांथों में
पापड़ बनी रोटियों को भी देखा है
लेकिन, एक दिन मैंने उसे
बालू के ढेर पर बैठे देख
अपने आप को झंझोरा है
क्योंकि...
मैंने उसे उस दिन
बालू फांकते देखा है...

किराया

ये शहर किराए का है
किराए पर मिलते है घर यहां
सीने में धड़कते दिलों के
जज्बात भी किराए का है

Wednesday, September 29, 2010

इंसानियत

ईश्वर-अल्ला एक है
एक है नानक-मसीह

इंसानियत से बढ़कर
धर्म ना दूजा कोई

Saturday, April 24, 2010

तपती धरती... तपता मन

तप रहा है सूरज
तप रही है धरती

धरती के तपने से
तप रहे हैं लोग

अब तो समाज के तपने से
तपने लगा है मेरा मन !

Friday, April 9, 2010

गोदना

गोदना से होता था
औरतों का श्रृंगार
औरतें गुदवाती थी
इसे अपने बाजू , पैर
और कभी-कभी पूरे शरीर पर

पुरुषों का भी प्रिय
रहा है गोदना

पहले काले रंग का होता था ये
समय के साथ
इसने बदला है अपना रंग और रूप
रंग के साथ इसने नाम भी है बदला
टैटू का नाम तो अपने सुना ही होगा

Saturday, April 3, 2010

पानी

पहले हम लिखते थे
पानी की कलकल
और...
उसमे कलरव करते
पंछियों के बारे में

अब हम लिखते है
बोतल में बंद पानी के रहस्य
और ...
सुनामी रूपी सैलाब के बारे में

क्या पानी सिर्फ
हाहाकार मचाता रहेगा
या फिर...
पानी के लिए हाहाकार मचता रहेगा !

Tuesday, March 16, 2010

कलम का सौदा

कलम का कलाकार हूँ
लेकिन...
मेरी इस कलाकारी का
कभी-कभार सौदा हो जाता है

कलम के सौदागर
इस बाज़ार में भरे पड़े हैं
जो गाहे- बगाहे
ऐसी सौदेबाज़िया करते rahte हैं

आप कहेंगें
मैं कितना बेशर्म हूँ
लेकिन क्या करूँ
अपने और अपनों के लिए
बेशर्मी दिखानी पड़ती है...